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राजस्थान: वैभव और वचनबद्धता

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राजस्थान की भूमि वीर प्रसूता भूमि कही जाती है। इतिहास  के पन्नों में राजस्थान अपने  भक्ति, शौर्य, बलिदान, वचनबद्धता और निष्ठा जैसे गुणों के लिए जाना जाता है।  ब्रिटिशकाल का राजपूताना कहलाने वाला यह राज्य अपनी गौरवमयी थाती के चलते एक अलग पहचान रखता है। यहां के किले, महल और इमारतें भव्यता का पर्याय हैं, जिनके झरोखों से झांक कर हम अपने समृद्ध इतिहास की झलक पाते हैं। लेकिन राजस्थान सिर्फ भव्यता और राजसी ठाठ ही नहीं वरन् बलिदान और स्वामिभक्ति के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां की मिट्टी में साहस और निडरता कूट–कूट कर भरी है, और यह गुण यहां के रहवासियों में भी कुछ कम नहीं। अपनी आन पर मर जाना भी स्वीकार करने वाले लोग इस भूमि पर हुए हैं। राजस्थान की गौरवशाली विरासत में महाराणा प्रताप और महाराणा कुंभा सरीखे शौर्यवान सपूत हुए हैं, जिन्होंने आतताइयों के विरुद्ध झुकने की बजाय कष्ट सहना स्वीकार किया, और इसी धरा पर पन्नाधाय सरीखी स्वामिभक्त भी हुई हैं, जिन्होंने राज्य के भविष्य के लिए अपने बालक तक को भेंट कर दिया। इसी भूमि पर महारानी पद्मिनी जैसी गर्वीली नारियां हुई हैं जिन्होंने अपने सम्मान क...

भारतीय त्योहार : उत्साह और उमंग का संचार

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छायाचित्र- यामिनी दशोरा भारतवर्ष को त्योहारों का देश ऐसे ही नहीं कहा जाता। यहां वर्ष भर त्योहारों का सिलसिला चलता है। भारत में मनाए जानें वाले त्योहार मुख्यत: तीन प्रकार के होते हैं: राष्ट्रीय त्योहार, धार्मिक त्योहार और मौसमी त्योहार। ■ राष्ट्रीय त्योहार : गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस, शिक्षक दिवस, गांधी जयंती, अंबेडकर जयंती, आदि हमारे प्रमुख राष्ट्रीय त्योहार हैं। सभी भारतीय इन त्योहारों को उत्साह और उमंग से मनाते हैं। ये त्योहार जनमानस में देशप्रेम का संचार करते हैं, और साथ ही हमें अपने कर्तव्यों की भी याद दिलाते हैं। ■ धार्मिक त्योहार : होली, दीपावली, रक्षाबंधन, ईद, गुरुनानक जयंती, क्रिसमस, आदि भारतवर्ष के प्रमुख धार्मिक त्योहार हैं। ये त्योहार हम भारतीयों में अनेकता में एकता की भावना को और सुदृढ़ करते हैं। जब पूरा देश मिलकर इन त्योहारों की खुशी मनाता है, तो भारतवर्ष की समृद्ध विरासत जीवंत हो उठती है। ■ मौसमी त्योहर : मकर संक्रांति, लोहड़ी, बैसाखी, पोंगल तथा और भी कई त्योहार ऋतुओं के हिसाब से मनाए जाते हैं।  ये त्योहार मौसम, स्थान और फसलों की कटाई के अनुसार भी मनाए जाते हैं, अ...

भारतीय मसाले : रंग, सुगंध, सेहत और स्वाद

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छायाचित्र- यामिनी दशोरा भोजन को स्वाद, सुगंध और रंग से सुशोभित करने वाले मसाले भारतीय रसोईघरों का अभिन्न अंग हैं। ये मसाले अपने में कई खूबियाँ समेटे हैं। भोजन में मसालों का  जितना  प्रयोग भारतीय उपमहाद्वीप  में होता है, उतना विश्व के किसी और देश में शायद ही हो। यही नहीं भारतीय उपमहाद्वीप के रहन-सहन के अनुसार प्रत्येक मसाले के अपने औषधीय गुण भी हैं। ये मसाले कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं जैसे वात, अपच, कृमि, अरुचि, मधुमेह, पेट दर्द, एसिडिटी, आदि रोगों के नियंत्रण में काफी लाभकारी हैं। असंख्य गुणों की खान, ये मसाले कुछ इस प्रकार हैं: ■ हल्दी  हल्दी या हरिद्रा न केवल खाने के रंग और स्वाद को बढ़ाती है, वरन् यह उत्तम औषधि भी है। सब्ज़ियों, अचार, पूड़ी, परांठे, पकौड़ी, और लगभग सभी चटपटे व्यंजनों का रंग और स्वाद  बढ़ाने के लिए हल्दी का प्रयोग किया जाता है। चोट ठीक  करने या मार निकालने में, सर्दी-जुकाम से बचाव और उपचार के लिए भी हल्दी लाभदायक है। ■ सूखा धनिया धनिये के सूखे दानों को पीसकर धनिया पाउडर बनाया जाता है। यह भोजन का स्वाद बढ़ाने के साथ इसे सुगंध भी देता है।...

ज्योतिष विज्ञान : ग्रह-नक्षत्रों का संज्ञान

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ज्योतिष की परिभाषा कुछ इस प्रकार है: कर्म-फल-विपाक-काल-विधानं अर्थात्, व्यक्ति के कर्मफल जब परिपक्व हों, उस समय या काल का विधान। इसका अर्थ यह है कि ज्योतिषशास्त्र विज्ञान और कर्मफल के स्तंभों और सिद्धांतों पर आधारित है। विदेशों में इंडियन एस्ट्रोलाॅजी के नाम से विख्यात  ज्योतिषशास्त्र को वेद का एक अंग माना जाता है। इस की उत्पत्ति सृष्टि के सृजन के साथ ही मानी गई है, और इसीलिए परमपिता ब्रह्मा को ही ज्योतिष का रचयिता माना गया है। वैदिक काल में यज्ञादि धार्मिक कार्य मुख्य हुआ करते थे, तथा इनके लिए शुभ मुहूर्त व समय  ज्योतिषशास्त्र से ही पता लगाया जाता था। दिलचस्प बात यह है कि प्राचीन काल में विद्वान पृथ्वी को ही ज्योतिषीय गणनाओं का केंद्र माना करते थे तथा उसी को आधार बनाकर अन्य ग्रहों की गतियों की गणना करते थे। जबकि वर्तमान में सौरमंडल का केंद्र सूर्य ही  ज्योतिषीय गणनाओं का केंद्र है।  भारतवर्ष में  ज्योतिष का विकास ग्रह-नक्षत्रों की गणना पद्धति के रूप में हुआ, परन्तु वर्तमान में इसे कई लोग भाग्य या भविष्य देखने की विद्या समझते हैं। लेकिन केवल यही  ज्योतिष की...

आंगन, पोल, तुलसी: मन, आस्था, चौकसी

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‌■आँगन  भारतीय घरों में आँगन का विशेष महत्व है। आँगन हमारी वास्तुकला का अभिन्न अंग रहा है। समुचित हवा और रोशनी के लिए घरों में इस संरचना का होना आवश्यक है। खुला आँगन प्रायः घर के मध्य भाग में स्थित होता है जिससे पूरे घर में हवा-रोशनी समान रूप से पहुँचकर घर के वातावरण को शुद्ध व कीटाणुरहित रखे। सांस्कृतिक दृ ष्टि से आँगन घर-परिवार की दिनचर्या और गतिविधियों का केंद्र हुआ करते थे। बड़े सवेरे की ठंडी हवा का आनन्द लेने के लिए परिवार के सदस्य आँगन की ही शरण लिया करते थे। इसके बाद रोज़ाना के काम जैसे कपड़े, बर्तन धोना, आदि आँगन में ही संपन्न हुआ करते थे। इसके बाद दोपहर का भोजन भी इसी आँगन में किया जाता था। सर्दियों की गुनगुनी धूप भी इसी आँगन से घर में पहुँचती थी।  शाम के समय यह आँगन आस-पड़ोस के लोगों की चहल-पहल और बच्चों की उछलकूद से गुलज़ार होता था। गर्मी के मौसम में प्रायः लोग यहीं सोया करते थे। रोज़मर्रा के इन कामों के अलावा आँगन में अचार-पापड़ सुखाना, सिलाई-बुनाई, पढ़ाई-लिखाई, आदि भी की जाती थी।  यही नहीं, घर में शादी-ब्याह या अन्य कोई आयोजन आँगन में ही संपन्न होते थे। लग्न ...

चौपड़ के खेल : भाग्य और कौशल का मेल

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चौपड़ का अर्थ है, चौरस(वर्गाकार) खानों से बनी आकृति। हांलांकि इस शब्द का प्रयोग अधिकतर चौसर के खेल के लिये किया जाता है। दिलचस्प बात यह है कि चौसर के अलावा साँप-सीढ़ी और शतरंज भी एक तरह से चौपड़ के खेल ही हैं, क्योंकि ये भी वर्गाकार खानों के रूप में ही होते हैं। हमारे लिये गर्व का विषय यह है कि इन सभी खेलों की जन्मस्थली भारत है। इनकी उत्पत्ति को लेकर मान्यताएँ और इनके विषय में कुछ रोचक तथ्य इस प्रकार हैं। ■ साँप-सीढ़ी माना जाता है कि साँप-सीढ़ी का खेल १३वीं शताब्दी में सन्त ज्ञानदेव द्वारा बनाया गया। इसका उद्देश्य खेलने वाले को नैतिकता का पाठ पढ़ाना था। इसके बाद इसमें कई बदलाव किये गये जिससे यह अपने वर्तमान स्वरूप में आया। साँप-सीढ़ी पूरी तरह से भाग्य का खेल है। इसमें पासे खुलने पर खिलाड़ी को साँप का काटा जाना पतन को दर्शाता है, जबकि सीढ़ी उन्नति की परिचायक है और जीत की ओर ले जाती है। साँप या सीढ़ी का मिलना केवल पासे गिरने की स्थिति अर्थात् भाग्य पर निर्भर करता है। ■ चौसर चौसर के खेल का वर्णन महाभारत में मिलता है, जहाँ इस खेल ने कहानी की दिशा मोड़ दी थी। इस खेल के चलते कई महत्वपूर्ण घटनाएँ हुईं...

यत्र नार्यस्तु पूज्यंते...

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यत्र नार्यस्तु पूज्यंते, रमन्ते तत्र देवता।  भारतवर्ष की धरोहर के स्वर्णिम पृष्ठों में से एक पृष्ठ है शक्ति के अभिज्ञान का। यहाँ 'नार्यस्तु पूज्यंते' का अभिप्राय नारी और नारित्व के सम्मान और समायोजन से है। इसका अर्थ है की यह भूमि युगों-युगों से नारी की शक्ति और सामर्थ्य को जानती और पहचानती रही है।  प्राचीन ग्रंथों और साहित्य में सदा से महिलाओं को स्वयंसिद्ध व विवेकशील माना गया है। उन्हें अपने निर्णय स्वयं लेने के लायक समझा जाता रहा है। नारी सशक्तीकरण जैसी योजनाओं की आवश्यकता हमारे देश को क्यों पड़ी, यह एक यक्ष प्रश्न है। क्योँकि, इस राष्ट्र की नारियाँ तो सदा से सशक्त और समर्थ रहीं हैं। उन्हें कठपुतली की तरह नचाया जाना कभी मंजूर नहीं रहा। भारत के इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जो शक्ति के साहस की मिसाल हैं। चाहे वो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई हो, जिन्होनें ब्रिटिश साम्राज्य के दांत खट्टे कर दिये या फिर वो राजस्थान की वीरांगनाएं हों जिन्होनें आतताइयों के समक्ष झुकने की बजाय स्वयं को अग्नि में आहूत कर दिया। बेगम रज़िया सुल्ताना, जिन्होनें ना केवल बाह्य बल्कि पारिवारिक विरोध भी सहा, ...